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अटल बिहारी वाजपेयी के 5 गुण जो आगे बढ़ने में हो सकती है अापकी मददगार

अटल बिहारी वाजपेयी के 5 गुण जो आगे बढ़ने में हो सकती है अापकी मददगार


• खुद पर भरोसा

अटल जी के चेहरे पर एक अलग किस्म के विश्वास का भाव होता था। व्यक्तिगत बातचीत हो, संसद या संसद से बाहर भाषण या फिर कविता पाठ, उनके मुख से निकली बात हृदय की गहराइयों से निकली प्रतीत होती थी। यही कारण है कि उसमें जितनी सरलता-सहजता होती थी, उतनी ही दूसरों के मर्म को छू लेने की क्षमता भी। दरअसल, किसी लीक पर चलने या किसी का दबाव महसूस करने की बजाय उन्हें अपने आप पर भरोसा था और यही उनकी ताकत भी थी। खुद पर भरोसा तभी हो सकता है, जब हम दूसरों के साथ-साथ अपने प्रति भी सच्चे हों।

सहृदयता
बड़े दिल का होना बहुत बड़ी बात होती है। हममें से तमाम लोग छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते हैं। एक-दूसरे से मुंह फुला लेते हैं। इसका असर आपसी व्यवहार और कामकाज पर साफ झलक जाता है, पर अटल जी बार-बार कहते थे कि 'मतभेद' स्वाभाविक है, लेकिन इसकी वजह से 'मनभेद' नहीं होना चाहिए। उन्होंने न सिर्फ ऐसा कहा, बल्कि अपने जीवन में हर बार करके भी दिखाया। जाहिर है कि उनके इस स्वभाव की वजह से ही सब उनके दोस्त ही रहे, चाहे वे किसी भी विचार या दल में क्यों न हों। उनकी दुश्मनी किसी से नहीं रही। वैचारिक रूप से उनका कट्टर से कट्टर विरोधी भी व्यक्तिगत स्तर पर उनका मुरीद था। दरअसल, यह उनका जादू ही था कि वे किसी को नाराज होने का मौका नहीं देते थे। यह सहृदयता भी उनकी एक बड़ी सीख है।

निराशा से दूर
अटल जी का पूरा जीवन इस बात का गवाह है कि पराजय या मन का न होने के बावजूद निराशा कभी उन पर हावी नहीं हो सकी। चाहे एक वोट से सरकार गिरने की बात हो या चुनाव में हार की बात हो, उन्होंने सभी को बड़े सहज भाव से लिया। हार को भूलकर वह हमेशा आगे की ओर देखते थे और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करते थे, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि अगर वे पूरे मन और ईमानदारी से काम करते हैं, तो एक न एक दिन उन्हें जीत मिलेगी ही। अटल ऐसे ही अटल नहीं हो गए थे। उनके 'अटल' होने के पीछे लंबा संघर्ष भी था। यह युवाओं के लिए भी एक बड़ा संदेश है कि कैसे हार या निराशा को खुद पर हावी न होने देते हुए सकारात्मक नजरिए के साथ अपना कर्म करते रहें।

सुनने का धैर्य
अटल जी एक ऐसे जननेता थे, जिनके पास कवि-हृदय था। हर कोई मानता है कि संभवत: यही करण है कि एक इंसान के रूप में वे बेहद संवेदनशील थे। अपनी ज्यादा कहने की बजाय उनमें दूसरों को सुनने का असीम धैर्य था। वे कम बोलते थे, पर जब बोलते थे तो अपनी धारदार बातों से हर किसी को निरुत्तर कर देते थे। चाहे सामने कोई भी हो। उनकी बातों में हंसी-ठिठोली भी होती थी और गूढ़ गहरी बातें भी। उनमें पद या शक्ति का कभी कोई अभिमान नहीं रहा। यह भी उनसे सीखने की बात है कि कैसे हम पहले इंसान हैं, जिसे पद या शक्ति की ताकत में चूर रहने की बजाय दूसरों के प्रति सदा इंसानियत का भाव रखना चाहिए।

सर्वस्वीकार्यता
यह अटल जी के गुणों में सबसे ऊपर माना जा सकता है। यह भी उनका स्वभावगत गुण था। वे सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करते थे। यह गुण तभी आ सकता है, जब आप दूसरों से अपनी बात मनवाने से पहले उनकी बात सुनते और मानते रहे हों। इसके पीछे पारस्परिक विश्वास का भाव भी है। यही कारण है कि चाहे कोई राजनीतिक विरोधी हो या फिर किसी भी धर्म और संप्रदाय से जुड़ा व्यक्ति, हर कोई उनका प्रशंसक रहा। उन्हें पता था कि किससे किस तरह अपनी बात पर हामी भरवानी है।

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